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भारत का रक्षा निर्यात, रणनीतिक समुद्री उपस्थिति, स्वदेशी उत्पादन नई ऊंचाइयों पर - राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रभावों को अभूतपूर्व मजबूती

कई वर्षों तक आतंकवाद के प्रति भारत की प्रतिक्रिया मुख्यतः कूटनीतिक स्तर तक सीमित रही, जबकि आम नागरिक अपने जीवन और संपत्ति की कीमत चुकाते रहे। बड़े आतंकवादी हमलों के बाद भी भारत का ध्यान अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने, आधिकारिक बयान जारी करने और वैश्विक मंचों के माध्यम से मुद्दा उठाने पर ही केंद्रित रहा।

वर्ष 2014 के बाद भारत में रक्षा आधुनिकीकरण केवल सैन्य उपकरणों को आधुनिक बनाने तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि देश अपनी सशस्त्र सेनाओं को कैसे तैयार करता है, उन्हें कैसे सुसज्जित करता है और भविष्य की चुनौतियों के लिए किस तरह सक्षम बनाता है जैसे मुद्दों में संरचनात्मक बदलाव तक पहुँच गया है। आयात पर निर्भरता कम करने से लेकर स्वदेशी रक्षा निर्माण, रणनीतिक आधारभूत ढांचे और भविष्य की तकनीकों को मजबूत करने तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का रक्षा-तंत्र दीर्घकालिक क्षमता निर्माण की दिशा में आगे बढ़ा है। इस परिवर्तन ने राष्ट्रीय सुरक्षा को भारत की औद्योगिक प्रगति, तकनीकी विकास और रणनीतिक आत्मनिर्भरता के साथ सीधे तौर पर जोड़ दिया है।

सुरक्षा वह बुनियादी आधार है जिस पर किसी भी राष्ट्र का विकास की नीव रखी जाती है। भारत की प्रगति को सीमाओं की स्थिरता, आंतरिक क्षेत्रों की शांति और साइबर तथा समुद्री क्षेत्र जैसे उभरते सुरक्षा आयामों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसलिए, सुरक्षित भारत विकसित भारत की पहली और सबसे अनिवार्य आवश्यकता है।

दशकों तक वामपंथी उग्रवाद (लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म) भारत की सबसे गंभीर और लगातार बनी रहने वाली आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में से एक रहा। इसका प्रभाव मुख्यतः मध्य और पूर्वी भारत के उन क्षेत्रों में दिखाई देता था, जहाँ शासन व्यवस्था अपेक्षाकृत कमजोर थी और ये क्षेत्र विकास से अछूते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने वर्ष 2014 के बाद इस चुनौती से निपटने के लिए सुरक्षा अभियानों, इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार, प्रशासनिक पहुँच, जनजातीय कल्याण और विकास-केंद्रित सुशासन को एक साथ जोड़ते हुए एक दीर्घकालिक रणनीति अपनाई है।