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कौशल विकास, उच्च शिक्षा, स्टार्टअप और खेलों के माध्यम से युवाओं को नई शक्ति देता भारत - आकांक्षाओं को अवसर का रूप, नई पीढ़ी में लीडरशिप निर्माण।

अतीत में भारतीय युवाओं को अक्सर विकास कार्यक्रमों के लाभार्थियों के रूप में देखा जाता था, न कि देश के भविष्य को आकार देने वाले सक्रिय भागीदारों के रूप में। युवाओं के पास विचार और आकांक्षाएँ तो थीं, लेकिन एक साथ काम करने, इनोवेशन करने और बड़े स्तर पर योगदान देने के अवसर सीमित थे। हालांकि, इनोवेशन प्रायः प्रयोगशालाओं और बड़े संस्थानों तक ही सीमित था, जबकि युवाओं के लिए नेतृत्व-क्षमता प्रदर्शित करने के मंच अपेक्षाकृत अनियोजित और असंबद्ध थे।

वर्ष 2010 में भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth Games) की मेज़बानी की और वैश्विक सुर्खियों में छा गया। लेकिन इस समारोह के आयोजन की उपलब्धि के साथ-साथ प्रबंधन में देरी, मैनेजमेंट से जुड़ी अन्य चिंताओं और व्यवस्थागत कमियों को लेकर असहज प्रश्न भी सामने आए। सुर्खियों से परे, इसने भारत की खेल व्यवस्था में मौजूद एक गहरी समस्या को उजागर किया। देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उभरते खिलाड़ियों की पहचान, उन्हें निरंतर प्रशिक्षण और सहयोग प्रदान करने के लिए एक सुदृढ़ एवं व्यवस्थित तंत्र का अभाव था। उस दौर में सफलता अक्सर संस्थागत समर्थन से अधिक व्यक्तिगत संघर्ष और दृढ़-संकल्प पर निर्भर करती थी।

एक दशक पहले तक भारत में एक युवा स्नातक को अक्सर एक आम दुविधा का सामना करना पड़ता था। हाथ में डिग्री होने के बावजूद उसे हमेशा नौकरी नहीं मिलती थी। अवसर सीमित थे, भर्ती की प्रक्रिया धीमी थी और व्यवसाय शुरू करने का विचार अनिश्चित तथा जोखिमपूर्ण माना जाता था। एंटरप्रेन्योरशिप के लिए संस्थागत समर्थन का अभाव था, पूंजी की उपलब्धता भी कठिन थी और अधिकांश युवा सुरक्षित नौकरी खोजने के अभ्यस्त थे, न कि रोजगार सृजित करने के लिए।

एक दशक पहले भारत की विशाल युवा आबादी को जनसांख्यिकीय लाभांश के बजाय अक्सर एक चुनौती के रूप में देखा जाता था। लाखों स्नातक सीमित अवसरों, कम रोजगार क्षमता और नवाचार या खेल प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त मंचों की कमी के साथ नौकरी के बाज़ार में प्रवेश करते थे। व्यवसाय शुरू करना जोखिमपूर्ण माना जाता था और अनेक प्रतिभाशाली युवाओं को बेहतर संभावनाओं की तलाश में विदेशों की ओर रुख करना पड़ता था।