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वित्तीय समावेशन, उद्यमिता, शिक्षा व लीडरशिप के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाता भारत — लैंगिक समानता, सुरक्षा और अवसरों को नई गति।

भारत की कृषि व्यवस्था हमेशा से महिला-श्रम पर आधारित रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से सक्रिय महिलाओं में उनकी हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है, और वे अक्सर किसी औपचारिक पहचान, ऋण सुविधा या आय की सुरक्षा के बिना ही बुवाई से लेकर पशुपालन तक अनेक भूमिकाएँ निभाती रही हैं।

कई विकासशील देशों में महिलाओं से जुड़े कानून अब भी केवल एक महत्वाकांक्षी आदर्शवादी दस्तावेज़ बनकर रह गए हैं। इसके विपरीत, भारत ने पिछले एक दशक में लैंगिक समानता को एक ठोस कानूनी व्यवस्था में बदलने का कार्य किया है, जिसमें पारिवारिक कानून, कार्यस्थल, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और न्याय व्यवस्था को ‘महिला-नीत विकास’ की एक संगठित सोच के साथ जोड़ा गया है।

नारी शक्ति से संबंधित सुधार महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहे हैं। और ये केवल अस्पतालों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक निर्धारकों को लक्षित करते हुए महिलाओं के जीवन, कार्य और सामाजिक परिस्थितियों को भी बेहतर बना रहे हैं।

भारत का ‘विकसित भारत’ या ‘विकसित देश’ बनने का सपना सिर्फ आधी आबादी की ताकत के बिना पूरा नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अब महिलाओं को नीति निर्माण के किनारे नहीं, बल्कि भारत के विकास के केंद्र में रखा जा रहा है। शिक्षा, सम्मान, अवसर और आर्थिक भागीदारी को विकास के अगले चरण की मजबूत नींव बनाया जा रहा है।