Loading


पिछलग्गू बनने से लेकर आत्मविश्वास के साथ दुनिया की अगुवाई करता भारत - ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज से ट्रेड डील, वैक्सीन आपूर्ति तक।

वैश्विक शक्ति संतुलन अब केवल अटलांटिक विश्व के इर्द-गिर्द केंद्रित नहीं रहा है। जैसे-जैसे आर्थिक विकास, रणनीतिक प्रभाव और भू-राजनीतिक ध्यान हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं, भारत इस परिवर्तन को आकार देने वाली प्रमुख शक्तियों में उभरकर सामने आया है। 2014 के बाद से निरंतर आर्थिक विस्तार, बढ़ती राज्य क्षमता, प्रौद्योगिकी उन्नति और रणनीतिक स्वायत्तता ने भारत को वैश्विक व्यवस्था के हाशिये से निकालकर उसके भीतर बढ़ते प्रभाव की स्थिति तक पहुँचाया है।

2014 के बाद से भारत की विदेश नीति पहले के दशकों की सतर्कता और हिचकिचाहट से आगे बढ़कर रणनीतिक स्वायत्तता के अधिक दृढ़ स्वरूप की ओर विकसित हुई है, जिसकी आधारशिला संयम और संप्रभु निर्णय क्षमता दोनों पर आधारित है। खंडित वैश्विक व्यवस्था के बीच मोदी सरकार ने लगातार दबावपूर्ण हस्तक्षेप या बाहरी रूप से थोपे गए परिणामों के बजाय वैधता, सहभागिता और संतुलन पर जोर दिया है।

2014 के बाद से भारत की विदेश नीति राष्ट्रीय विकास के एक प्रमुख साधन के रूप में विकसित हुई है, जो पारंपरिक कूटनीतिक चिंताओं से आगे बढ़कर दीर्घकालिक राष्ट्रीय क्षमता और अनुकूलन क्षमता के निर्माण पर केंद्रित हुई है। अब बाहरी सहभागिता को आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी उन्नति, बुनियादी ढांचे के विकास तथा महत्वपूर्ण संसाधनों और बाज़ारों तक पहुँच जैसी घरेलू प्राथमिकताओं के साथ निकटता से जोड़ा गया है। न्यू इंडिया के इस दृष्टिकोण में कूटनीति को विकसित भारत के उद्देश्यों के अनुरूप आकार दिया जा रहा है, जहाँ व्यापार, निवेश, संपर्कता और प्रौद्योगिकी सहयोग अलग-अलग नीतिगत क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और रणनीतिक नींव को मजबूत करने के एकीकृत साधन बन चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार अब केवल पारंपरिक अर्थों में एक आर्थिक गतिविधि नहीं रह गया है; यह रणनीतिक योजना, जोखिम प्रबंधन और भू-राजनीतिक स्थिति निर्धारण का एक महत्वपूर्ण साधन बन चुका है। लेकिन 2014 के बाद ही यह दृष्टिकोण अधिक संगठित प्रयास के रूप में विकसित हुआ, जिसका उद्देश्य बाज़ारों का विविधीकरण, आर्थिक साझेदारियों को मजबूत करना और बाहरी व्यापार समझौतों को घरेलू औद्योगिक तथा रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाना रहा है। मोदी सरकार की व्यापार नीति को आपूर्ति शृंखला सुरक्षा, साझेदार देशों की विश्वसनीयता और दीर्घकालिक राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों जैसे विचारों ने आकार दिया है।