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पुरावशेषों की वापसी, मैन्युस्क्रिप्ट्स के डिजिटलीकरण, विरासत स्थलों, भाषाओं व पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन से अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को पुनर्जीवित करता भारत।

सार्वजनिक स्मृतियाँ केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि पत्थरों और कांसे में भी उकेरी जाती हैं। स्वतंत्रता के दशकों बाद तक भारत के अनेक प्रमुख सार्वजनिक स्थल औपनिवेशिक नामों, खाली चबूतरों या तटस्थ प्रतीकों से जुड़े रहे, मानो भारत गणराज्य अपनी सभ्यतागत एवं सांस्कृतिक विरासत को प्रमुखता देने में संकोच कर रहा हो।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 में एक ऐसी सभ्यता विरासत में मिली थी जो राजनीतिक रूप से सात दशकों से स्वतंत्र तो थी, किंतु मानसिक रूप से अभी भी औपनिवेशिकता की जंजीरों में जकड़ी हुई थी।

स्वतंत्र भारत में अधिकांश समय धार्मिक इंफ्रास्ट्क्चर को ज्यादा से ज्यादा एक सांस्कृतिक दायित्व समझा गया, और कई बार तो इसे एक राजनीतिक बोझ के रूप में देखा गया।

भारत जैसे विशाल देश में कभी भी केवल एक ही भाषा प्रचलित नहीं रही। यह देश 780 भाषाओँ में अपने विचार अभिव्यक्त करता है। स्वतंत्र भारत के इतिहास के लंबे कालखंड में इस भाषाई बहुलता को एक ऐसी प्रशासनिक समस्या के रूप में देखा गया, जैसे यह हिंदी और गैर-हिंदी भाषी राज्यों, क्षेत्रीय भाषाएँ बोलने वाले समुदायों तथा उत्तर और दक्षिण भारत को बांटने वाली एक विभाजन रेखा हो। इस विभाजन को साधने में जितनी राजनीतिक ऊर्जा खर्च हुई, उतनी शायद ही कभी उस गहरी सांस्कृतिक चेतना और विरासत को सम्मान देने में लगाई गई, जो इसके मूल में निहित थी।