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बढ़ते निर्यात, डिजिटल पेमेंट, उच्च जीएसटी संग्रह और ऐतिहासिक निवेश के साथ एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा भारत - विकास और वैश्विक उपस्थिति को नई गति।

आज भारत की आर्थिक वृद्धि केवल उसकी रफ्तार से परिभाषित नहीं होती, बल्कि विकास की गुणवत्ता और विश्वसनीयता से भी तय होती है। 22 लाख करोड़ रुपए से अधिक के GST संग्रह और एनपीए के ऐतिहासिक रूप से घटकर 2.15% तक पहुँचने के साथ, भारत एक वृहद् संरचनात्मक बदलाव से गुजर रहा है। यह परिवर्तन नकदी और अव्यवस्था आधारित अर्थव्यवस्था से अनुपालन, औपचारिकता, पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन पर आधारित व्यवस्था की ओर हो रहा है।

करीब एक दशक पहले तक भारत के करोड़ों लोगों ने कभी बैंक के अंदर कदम तक नहीं रखा था। उनकी बचत रसोई के डिब्बों में रखी जाती थी, उधार के लिए स्थानीय साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता था, और औपचारिक वित्तीय व्यवस्था उन्हें किसी दूसरी दुनिया की चीज़ लगती थी।

पिछले कई वर्षों तक भारत को एक लगातार उठने वाले सवाल का सामना करना पड़ा कि, आखिर इतनी विशाल क्षमता वाला देश उस मैन्युफैक्चरिंग लहर से कैसे चूक गया, जिसने पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया को आर्थिक महाशक्ति बना दिया?

भारत के उदय को लंबे समय तक प्रभावशाली GDP आँकड़ों, तेज़ी से बढ़ते बाज़ारों और विशाल युवा आबादी के पैमाने पर आँका जाता रहा है। निस्संदेह, ये सभी किसी भी उभरती शक्ति की महत्त्वपूर्ण पहचान हैं। लेकिन इतिहास यह बताता है कि केवल तेज़ आर्थिक वृद्धि भर किसी देश को वैश्विक अर्थव्यवस्था में वास्तविक रूप से निर्णायक और अपरिहार्य नहीं बनाती।